संसद चाहे कैसी हो कानून वही बना सकता है। इसलिये संसद को चाहे हम जितनी गाली दे, आलोचना करे, जब तक हमारे (जनता) के मन मुताबिक संसद का गठन नहीं हो पाएगा तब तक जन लोकपाल बिल पारित नहीं हो पायेगा। क्योकी वर्तमान संसद के सासंद सदस्यों ने जनमत के दबाव के कारण जनलोकपाल बिल पर सहमत हुवे और बाद में संसद दिए हुवे वादे से मुकर जाने के बाद अब हमारे (जनता) पास चुनाव में जाने के अलावा शायद कोई चारा बचा ही नहीं है। इसलिए मजबूरी में लिया गया यह निर्णय को हम, लोकतंत्र के पहियों को मजबूती प्रदान करने व स्वच्छता प्रदान करने के रूप में देखते है।
लेकिन जब अन्ना जी ने आंदोलन की समाप्ति की घोषणा की तो साथ ही टीम अन्ना को भी भंग कर दिया, भविष्य में आंदोलन की सम्भावना को ही समाप्त कर दिया, ये अत्यंत दुखद और ब्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई को कमजोर करने वाला निर्णय था। हमारा मानना है की इंडिया अगेंस्ट कारप्सन के नाम से देश में ब्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई को आन्दोलन के माध्यम से भी चलना चाहिए। ब्यवस्था परिवर्तन के लक्ष्य को पाने के लिए ये जरुरी है की सड़क को खामोश नहीं होना चाहिए। अरविन्द जी संसद में अपनी पार्टी के माध्यम से जो कुछ करना चाहते है करे, पर अन्ना जी के नेतृव में एक आन्दोलनकारियो की टीम होनी चाहिए जो बाहर से लगातार संसद पर दबाव डाले और जनता को जागरूक करे। सड़को पर अन्ना जी के सिपाही मशाल जलाये रखे, संसद और विधानसभाओ में अरविन्द जी की निगरानी में क्रन्तिकारी राजनैतिक विकल्प की मशाल जलाये, सड़क से संसद तक, जनपथ से राजपथ तक ब्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई चलती रहनी चाहिए। अन्ना जी के इस टीम के कोर कमेटी में वही लोग रहे जो आजीवन चुनाव में भाग न लेने की शपत ली हो। जब तक दोनों तरह से लड़ाई समान्तर नहीं लड़ी जायेगी, वेवस्था परिवर्तन के लिए आवश्यक उर्जा को लंबे समय तक उत्सर्जित नहीं की जा सकती है।
यदि यह प्रयोग सफल हो गया तो सच मानिये देश प्रगति की ओर अग्रसर होते हुए पुरानी सोने की चिड़िया के रूप में प्रसिद्धि पा सकता है, बशर्ते जनता भी उतनी ही ताकत व क्षमता से अन्ना जी और अरविन्द जी के इस दिशा में बढ़े हुये कदम का ताल ठोककर साथ दें।



